Vasudev Sharan Agrawal: महान अध्येता का जीवन परिचय
Vasudev Sharan Agrawal Ka Jeevan Parichay
वासुदेव शरण अग्रवाल भारतीय साहित्य, संस्कृति और इतिहास के गंभीर अध्येता थे। वह एक ही साथ लेखक, इतिहासकार, कला-मर्मज्ञ, पुरातत्त्ववेत्ता, दार्शनिक, लिपिशास्त्री, शब्दशास्त्री, भाषाशास्त्री और अन्वेषक भी थे। बता दें कि साहित्य, कला, संस्कृति और प्राचीन इतिहास पर उन्होंने अनेक ग्रंथों का सृजन किया था।
| नाम | वासुदेव शरण अग्रवाल (Vasudev Sharan Agrawal) |
|---|---|
| जन्म | 07 अगस्त, 1904 |
| जन्म स्थान | मेरठ जिला, उत्तर प्रदेश |
| पिता का नाम | गोपीनाथ अग्रवाल |
| शिक्षा | पीएच.डी., डी. लिट्. |
| निधन | 27 जुलाई, 1966 |
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं कला के महान् अध्येता वासुदेव शरण अग्रवाल का जन्म 07 अगस्त, 1904 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में स्थित खेड़ा नामक ग्राम में हुआ था। वासुदेव शरण अग्रवाल के पिता का नाम 'गोपीनाथ अग्रवाल' था। जबकि माता का नाम 'सीता देवी अग्रवाल' था। बताया जाता है कि उनका बचपन लखनऊ में बीता था। वहीं संस्कृत विद्वान् पं. जगन्नाथ से संस्कृत का प्रारंभिक ज्ञान प्राप्त किया।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के बाद उन्होंने वर्ष 1929 में लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.ए. किया। फिर लखनऊ विश्वविद्यालय से ही वर्ष 1941 में 'डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी' के निर्देशन में 'इंडिया एज नोन टू पाणिनि' विषय पर पीएच.डी. तथा 1946 में डी. लिट्. की उपाधि प्राप्त की।
साहित्यिक योगदान
वासुदेव शरण अग्रवाल ने वैदिक और पौराणिक साहित्य के गूढ़ ज्ञान को सरल भाषा में समाज के समक्ष प्रस्तुत करने का कार्य किया था। वहीं उनकी श्रेष्ठ कृति 'पाणिनिकालीन भारतवर्ष' में पाणिनि की अष्टाध्यायी के माध्यम से तत्कालीन भारत की संस्कृति एवं जीवन-दर्शन पर विशद प्रकाश डाला गया है। इसके अलावा उन्होंने वैदिक संस्कृति, साहित्य, इतिहास, धर्म-दर्शन, मूर्तिकला और वास्तुकला आदि विषयों पर सहस्राधिक निबंध भी लिखे हैं।
प्रमुख रचनाएँ
- पाणिनिकालीन भारतवर्ष (1955)
- हर्षचरित - एक सांस्कृतिक अध्ययन (1953)
- कला और संस्कृति (1952)
- माता भूमि (1953)
- भारत की मौलिक एकता (1954)
- पृथ्वी-पुत्र (1949)
कार्यक्षेत्र
वासुदेव शरण अग्रवाल ने कई अनुपम ग्रंथों की रचना करने के साथ अनेक पदों पर रहकर अपनी सेवाएं दी हैं। वे वर्ष 1940 तक मथुरा के पुरातत्व संग्रहालय के अध्यक्ष पद पर रहे। फिर 1946 से 1951 तक 'सेंट्रल एशियन एक्टिविटीज म्यूजियम' के सुपरिंटेंडेंट और 'भारतीय पुरातत्व विभाग' के अध्यक्ष पद पर कार्य किया। इसके बाद वर्ष 1951 में 'बनारस हिंदू विश्वविद्यालय' के 'कॉलेज ऑफ इंडोलॉजी' में प्रोफेसर नियुक्त हुए।
भाषा शैली
वासुदेव शरण अग्रवाल की भाषा शैली उत्कृष्ट और पांडित्यपूर्ण है। उनकी भाषा शुद्ध व परिष्कृत खड़ी बोली है। वहीं विषय के अनुरूप उनकी भाषा का स्वरूप बदलता रहता है। उन्होंने अपनी भाषा में अनेक प्रकार के देशज शब्दों का प्रयोग किया है, जिसके कारण इनकी भाषा सरल, सुबोध एवं व्यव्हारिक लगती है। किंतु उर्दू, अंग���रेजी आदि की शब्दावली, मुहावरों एवं लोकोक्तियों का प्रयोग उनकी रचनाओं में नहीं मिलता। बता दें कि उनकी भाषा शैली में उनके व्यक्तित्व और विद्वता की झलक साफ़ नजर आती है।
निधन
वासुदेव शरण अग्रवाल का 66 वर्ष की आयु में 27 जुलाई, 1966 को वाराणसी में निधन हो गया था। किंतु आज भी वे अपनी अनुपम कृतियों के लिए जाने जाते हैं। वहीं, साहित्य में अपना विशेष योगदान देने के लिए उन्हें 'साहित्य अकादमी' द्वारा सम्मानित किया गया था।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न: वासुदेव शरण अग्रवाल का जन्म कब हुआ था?
उत्तर: उनका जन्म 07 अगस्त, 1904 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में हुआ था।
प्रश्न: वासुदेव शरण अग्रवाल की प्रमुख कृति कौनसी है?
उत्तर: 'पाणिनिकालीन भारतवर्ष' उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति मानी जाती है।
प्रश्न: वासुदेव शरण अग्रवाल किस युग के लेखक हैं?
उत्तर: वह आधुनिक काल के प्रतिष्ठित लेखक हैं।
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